'संविधान-दिवस' और 'हम भारत के लोग'!
'संविधान-दिवस' और 'हम भारत के लोग'
-अशोक प्रकाश
आज 'संविधान-दिवस' है!...पता नहीं क्यों पिछले कुछ सालों से भारत की आज़ादी के संघर्षों के प्रतीकों से कुछ लोगों को विशेष लगाव प्रदर्शित करने की जरूरत पड़ रही है! पता नहीं, आज़ादी के संघर्षों से उन्हें विशेष प्यार उमड़ आया है या वे इस प्रदर्शन से अपने पुरोधाओं के सद्कर्मों से संतुष्ट नहीं हैं और उन्हें बताना पड़ रहा है कि देखो, हम भी देशप्रेमी हैं, देशभक्त हैं...हम भी आज़ादी के संघर्षों से खुद को जोड़ते हैं। 'संविधान-दिवस' के प्रचार-प्रसार के इस नए दौर से कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है। वरना, हम सब जानते हैं कि आज ही के दिन-26 नवम्बर, 1949 को देश के संविधान को 'आत्मार्पित' किया गया था! इस 'आत्मार्पण' की प्रक्रिया से दूर रहे कुछ लोग मनुस्मृति के संविधान को आज भी अपना सर्वश्रेष्ठ मार्ग-दर्शक मानते हैं और चाहते हैं कि 26 नवम्बर को अपनाए गए संविधान का राज नहीं, 'रामराज' आए ! 'हम भारत के लोग' इस बात को अच्छी तरह समझते हैं और जानते हैं कि वे ताक़तें कौन हैं और क्यों एक तरफ 'रामराज' लाने की कोशिश करती हैं तो दूसरी तरफ भारत के मुक्ति-संघर्षों से खुद को जोड़ने का ढकोसला करती हैं।
भारत के इस संविधान-दिवस पर सबसे अधिक इसी बात को समझने की जरूरत है ताकि 'संविधान का राज'का ढकोसला कर कोई हिटलरी-विधान न लागू कर पाए!
-अशोक प्रकाश
आज 'संविधान-दिवस' है!...पता नहीं क्यों पिछले कुछ सालों से भारत की आज़ादी के संघर्षों के प्रतीकों से कुछ लोगों को विशेष लगाव प्रदर्शित करने की जरूरत पड़ रही है! पता नहीं, आज़ादी के संघर्षों से उन्हें विशेष प्यार उमड़ आया है या वे इस प्रदर्शन से अपने पुरोधाओं के सद्कर्मों से संतुष्ट नहीं हैं और उन्हें बताना पड़ रहा है कि देखो, हम भी देशप्रेमी हैं, देशभक्त हैं...हम भी आज़ादी के संघर्षों से खुद को जोड़ते हैं। 'संविधान-दिवस' के प्रचार-प्रसार के इस नए दौर से कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है। वरना, हम सब जानते हैं कि आज ही के दिन-26 नवम्बर, 1949 को देश के संविधान को 'आत्मार्पित' किया गया था! इस 'आत्मार्पण' की प्रक्रिया से दूर रहे कुछ लोग मनुस्मृति के संविधान को आज भी अपना सर्वश्रेष्ठ मार्ग-दर्शक मानते हैं और चाहते हैं कि 26 नवम्बर को अपनाए गए संविधान का राज नहीं, 'रामराज' आए ! 'हम भारत के लोग' इस बात को अच्छी तरह समझते हैं और जानते हैं कि वे ताक़तें कौन हैं और क्यों एक तरफ 'रामराज' लाने की कोशिश करती हैं तो दूसरी तरफ भारत के मुक्ति-संघर्षों से खुद को जोड़ने का ढकोसला करती हैं।
भारत के इस संविधान-दिवस पर सबसे अधिक इसी बात को समझने की जरूरत है ताकि 'संविधान का राज'का ढकोसला कर कोई हिटलरी-विधान न लागू कर पाए!
संविधान दिवस अमर रहे। जनता का संविधान ज़िंदाबाद!
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