आत्मालाप-22: आज पुरुष-दिवस नहीं है...



                           आज पुरुष-दिवस नहीं है...

                                                -अशोक प्रकाश

भारत-माता के पुरुषों!
आज
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है
मतलब कम से कम
आज पुरुष-दिवस नहीं है!...

मनाइए
सुबह की चाय आप बनाइए
आठ रुपये में से दो रुपये
श्रमशक्ति का मूल्य बचाइए
फिर
दिन भर का हिसाब लगाइए...

हाल फ़िलहाल अगर आपने 
जूते की लय के साथ
कोई 'सांसद'-भाषा देखी-सुनी है
तो कम से कम आज
'असंसदीय' हो जाइए
आज किसी को
माँ-बहन की गालियाँ मत सुनाइए...

भारत-माता के श्रीमान पुरुषों!
शंका-संदेह के किसी बियावान से
अगर आपके मन में आज
तलाक-तलाक की कोई धुन
सुनाई पड़ रही हो 
तो अपना छप्पन इंच का सीना
पाकिस्तान में कूदकर बढ़ाइए
जाइए
सैनिकों और असैनिकों की 
विधवाओं का दुःख-दर्द बँटाइए...

और
भारत-माता की हे महिलाओं!
तुमसे भी एक विनती है
श्रृंगार के अपने मुख्य अवयवों पर
ध्यान देने से पहले
एक बार सोचो
ये नाक-कान-मुँह-गला
हाथ-पैर
कलाई-उँगली और
सिंदूर के काम आने वाला माथा
कब से और क्यों
रस्सी, लोहा, चांदी अथवा
सोने-हीरों के बंधनों से 
बंधने लगा?
जबकि पुरुष तुमसे ज़्यादा
खूबसूरत नहीं होते
लेकिन गहने पहनने का शौक
आखिर उनमें क्यों नहीं जगा?...

हे भारत की माताओं, बेटियों, बहनों!
स्त्री होने का तुम्हारा 'सौभाग्य'
आखिर दुर्भाग्य बनकर
तुम्हारे गले क्यों लटका है सदियों से
और केवल गालियाँ ही नहीं
घर और गलियां भी अटीपटी हैं
इस पौरुष-दुर्गंध से?... ★★★

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