Posts

फागुन रंग रंगीला-5: बनी बतिया बिगड़ गै मोरे भाई...

                                  अ   व   धी   फा   ग                                            प्रस्तुति : रामचंद्र शुक्ल         अवधी फाग - 5  बनी बतिया बिगड़ गै मोरे भाई.. . बनी बतिया बिगड़ गै मोरे भाई कोउ सकै न बनाई। बनी बिगड़ गै राजा दशरथ कै राम लखन बन जाई, अपुना तौ सरग के धाम चला गएँ सब अपजस केकई पै आई, अरे भइया भरत गए हैं घबराई, कोउ सकै न बनाई। बनी बिगड़ गै राजा रावन कै हरिस जानकी माई, राज-पाट लंका सब छूटे, भाई विभीसन घर से रुठे, अरे हनुमान दिहें लंका जलाई, कोउ सकै न बनाई। बनी बिगड़ गै दुरजोधन कै कृष्न रहे समझाई, पांच गाँव पांडव का दीजै, बाकी राज आप कुल कीजै, अरे वै तो कृष्नौ का दिहें दुरियाई, कोउ सकै न बनाई। बनी बिगड़ गै भाई अब केहकै हम नही सकित बताई, ज्ञानी हुवै कोउ गाय के सुनावै, बीच सभा ...

फागुन रंग रंगीला-4: बाजि रही पैजनियाँ...

                                    अ   व   धी   फा   ग                                            प्रस्तुति :  राजधर दूबे  अवधी फाग- 4 बाजि रही पैजनिया छमाछम  बाजि रही पैजनिया । के हो गढ़ावय पांव पैजनिया के हो कमर करधनिया ,  हां हां के हो कमर करधनिया,  के हो गढ़ावय मोहनमाला ,  के हो ऽऽ अरे के हो , अरे के हो गढ़ावय झुलनिया , छमाछम बाजि रही पैजनिया। कइसे के टूटइ पांव पैजनिया कइसे कमर करधनिया,  हां हां कइसे कमर करधनिया,  कइसे के टूटइ मोहनमाला हां हां कइसे भला कइसे,  भला कइसे के टूटइ झुलनिया छमाछम बाजि रही पैजनिया। चलत फिरत के पांव पैजनिया  निहुरत कमर करधनिया ,  हां हां निहुरत कमर करधनिया , अरे लपट- झपट में मोहनमाला हाँ  चुम्मा अरे चुम्मा , अरे चुम्मा के लेत झुलनिया छमाछम बा...

फागुन रंग रंगीला-3: बियाहन आये...

                               अ   व   धी   फा   ग                                         प्रस्तुति :  रामचन्द्र शुक्ल  अवधी फाग- 3 महिमा कोउ जान न पाए, गिरिजापति बरात सजाए, बियाहन आए। भसम रमाय डमरू कर लीन्हा, भांग धतूर खजाना कीन्हा, वाहन बैल सजाए, भसम भभूत बिराजत अंगा, गले नाग सिर सोहत गंगा, डम-डम डमरू डमकाए, संग भूत अनेकन आए, बियाहन आए। झालर लाग गज मोतिन माला, धन्य बैल शिवशंकर वाला, सोने से सींग मढ़ाये, नाथ हाथ अपने पहिराए, कंचन से खुर देत मढ़ाए, मानो लाल ललाट लगाए, बाघम्बर चर्म सुहाए, बियाहन आए। हुड़का बैलवा चला दैके हूकी, शोभा का बरनौ हम शिवजी की, खबर हिमांचल पाए, नगर के लोग सबै उठि धाए, देखि बरात विषाद बढ़ाए, सखी गौरा से जायके बताए, तोरा बाउर भांग चबाए, बियाहन आए। जिन अफसोस करा मन माहीं, करम लिखा पायो बर ताहीं, मन मा अति हर...

फागुन रंग रंगीला-2: कठिन ब्रजनारी...

                           अ   व   धी   फा   ग                                          प्रस्तुति :  रामचन्द्र शुक्ल  अवधी फाग -2 बनि आये बैद बनवारी, कठिन ब्रजनारी। बन के बैद गलिन मां घूमैं कहैं पुकारि-पुकारी, है कोई मर्ज दवा हम देबै हम सबकै दियब दुख हारी कठिन ब्रजनारी। सुनहुं हकीम कहत हैं राधा हमरे नहीं बीमारी, चलौ महल मा आदर करबै अरे बैदा भोरे धरेहुं मोरी नारी, कठिन ब्रज नारी। कैसे के नारी तोरी पकरौं राधिका  अरे हमैं लोगवा लगाय देहैं गारी, चलौ कुंजन बन बूटी देबै हरबै पीर तुम्हारी, सूर स्याम बलि जाहुं चरन की नस-नस कै दियब दुख हारी कठिन ब्रज नारी।  ■■■

फागुन रंग रंगीला -1:मोहन मारै डाका..

                                      अ   व   धी  फा  ग                                                       प्रस्तुति : रामचन्द्र शुक्ल  अवधी फाग- 1 मोहन मारै डाका.. ( लोककवि शिव परसाद रचित) देखै मा छयल बड़ा बांका बेटा बिगड़ा है नंद बबा का मोहन मारै डाका। भितरा से निकरब जुलुम होइगा दइया  नई नई नारि देख दौड़ै कन्हैया  घेरय गलियवन कै नाका। कबहूं न जाब अकेली भरै पनिया पाले अहैं सांड जसोमति रनिया, इनकै चोरिया मा बढ़ा अहै साका यै तो लूट लेइहैं सगरौ इलाका मोहन मारै डाका। मरत रहें दाना की संसतिया रोय-रोय काटैं दिना और रतिया करत रहे नित फांका, मठवा पियाय हम इनका जियावा तौने कै सजनी आज फल पावा, खुद खाएं दहयवा कै थाका विरवा कै करैं नहीं ताका मोहन मारै डाका। धोवत सिर बाल रहिउं जमुना के घटवा कतहूं से ...

जिसके हाथों में लाठी है:

                               जिसके हाथों में लाठी है....                                                 -आचार्य बलवन्त  जिसके हाथों में लाठी है    उसकी है सरकार गुरू।   अच्छे से चल रहा इन दिनों  उसका कारोबार गुरू।  उसी का सी.एम.,उसी का डी.एम.  उसी का तहसीलदार गुरू।  गाँवों के संसाधन पर  उसी का है अधिकार  गुरू।  खूब खिलाता, खूब पिलाता  तरह तरह से दिल बहलाता सुबह-शाम उसके गुण गाता   शहर का  हर अख़बार गुरू।  अच्छे से चल रहा इन दिनों  उसका कारोबार गुरू।  रूप बदलकर,रंग बदलकर बात-चीत का ढंग बदलकर  निभा रहा है भाँति-भाँति के  भले-बुरे किरदार गुरू।...   जिसके हाथों में लाठी है    उसकी है सरकार गुरू।   अच्छे से चल रहा इन दिनों  उसका कारोबा...

देश:

                                  यदि तुम्हारे घर के                            एक कमरे में आग लगी हो!...                                                -सर्वेश्वर दयाल सक्सेना  यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में आग लगी हो तो क्या तुम दूसरे कमरे में सो सकते हो ? यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में लाशें सड़ रहीं हों तो क्या तुम दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो ? यदि हाँ तो मुझे तुम से कुछ नहीं कहना है । देश काग़ज़ पर बना नक्शा नहीं होता कि एक हिस्से के फट जाने पर बाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहें और नदियाँ, पर्वत, शहर, गाँव वैसे ही अपनी-अपनी जगह दिखें अनमने रहें । यदि तुम यह नहीं मानते तो मुझे तुम्हारे साथ नहीं रहना है । इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ा कुछ भी नहीं है न ईश्वर न ज्ञान ...