फागुन रंग रंगीला -1:मोहन मारै डाका..
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प्रस्तुति: रामचन्द्र शुक्ल
अवधी फाग-1
मोहन मारै डाका..
(लोककवि शिव परसाद रचित)
देखै मा छयल बड़ा बांका
बेटा बिगड़ा है नंद बबा का
मोहन मारै डाका।
भितरा से निकरब जुलुम होइगा दइया
नई नई नारि देख दौड़ै कन्हैया
घेरय गलियवन कै नाका।
कबहूं न जाब अकेली भरै पनिया
पाले अहैं सांड जसोमति रनिया,
इनकै चोरिया मा बढ़ा अहै साका
यै तो लूट लेइहैं सगरौ इलाका
मोहन मारै डाका।
मरत रहें दाना की संसतिया
रोय-रोय काटैं दिना और रतिया
करत रहे नित फांका,
मठवा पियाय हम इनका जियावा
तौने कै सजनी आज फल पावा,
खुद खाएं दहयवा कै थाका
विरवा कै करैं नहीं ताका
मोहन मारै डाका।
धोवत सिर बाल रहिउं
जमुना के घटवा
कतहूं से आय पहुँचा हरहटवा
मारै बगलिया से धाका,
'शिव परसाद' परी हैं भहराई
दुइनौ हथवा फिर लेत उठाई,
उनकी चोलिया कै
टूटि गए टांका
उनकै जोबना दुखैं जैसे पाका
मोहन मारै डाका। ■■■
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