फागुन रंग रंगीला-3: बियाहन आये...


                              अ  व  धी  फा  ग
 
                                     प्रस्तुति: रामचन्द्र शुक्ल 


अवधी फाग-3

महिमा कोउ जान न पाए,
गिरिजापति बरात सजाए,
बियाहन आए।

भसम रमाय डमरू कर लीन्हा,
भांग धतूर खजाना कीन्हा,
वाहन बैल सजाए,
भसम भभूत बिराजत अंगा,
गले नाग सिर सोहत गंगा,
डम-डम डमरू डमकाए,
संग भूत अनेकन आए,
बियाहन आए।

झालर लाग गज मोतिन माला,
धन्य बैल शिवशंकर वाला,
सोने से सींग मढ़ाये,
नाथ हाथ अपने पहिराए,
कंचन से खुर देत मढ़ाए,
मानो लाल ललाट लगाए,
बाघम्बर चर्म सुहाए,
बियाहन आए।

हुड़का बैलवा चला दैके हूकी,
शोभा का बरनौ हम शिवजी की,
खबर हिमांचल पाए,
नगर के लोग सबै उठि धाए,
देखि बरात विषाद बढ़ाए,
सखी गौरा से जायके बताए,
तोरा बाउर भांग चबाए,
बियाहन आए।

जिन अफसोस करा मन माहीं,
करम लिखा पायो बर ताहीं,
मन मा अति हरषाए,
'कालिका बकस सिंह
जुट गए नागर,
शंकर-गौरा कै होय लागी भांवर,
सखियाँ सब मंगल गाए,
मानो देव सुमन बरसाए,
बियाहन आए। ■■■

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