फागुन रंग रंगीला-2: कठिन ब्रजनारी...

                           व  धी  फा  ग
   
                                    प्रस्तुतिरामचन्द्र शुक्ल 

अवधी फाग-2

बनि आये बैद बनवारी,
कठिन ब्रजनारी।

बन के बैद गलिन मां घूमैं
कहैं पुकारि-पुकारी,
है कोई मर्ज दवा हम देबै
हम सबकै दियब दुख हारी
कठिन ब्रजनारी।

सुनहुं हकीम कहत हैं राधा
हमरे नहीं बीमारी,
चलौ महल मा आदर करबै
अरे बैदा भोरे धरेहुं मोरी नारी,
कठिन ब्रज नारी।

कैसे के नारी तोरी पकरौं राधिका 
अरे हमैं लोगवा लगाय देहैं गारी,
चलौ कुंजन बन बूटी देबै
हरबै पीर तुम्हारी,
सूर स्याम बलि जाहुं चरन की
नस-नस कै दियब दुख हारी

कठिन ब्रज नारी। ■■■

Comments

Popular posts from this blog

नियमकाल में बुलडोजर के नियम

हम देश, हमारा देश- 1: ऐ बनारसी विकास

कार्ल मार्क्स, मार्क्सवाद और उनके विरोधी