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हम उत्सवधर्मी!...

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                                  हम उत्सवधर्मी!...               हमारे समाज की यह एक विशेष बात है कि हम अपनी सदियों पुरानी परंपराओं को छोड़ने को तैयार नहीं होते। उससे नुकसान हो या फ़ायदा- हम ज़्यादा नहीं सोचते!...यूरोपीय देशों के लोगों और हममें यह अंतर आसानी से देखा जा सकता है। राहुल सांस्कृत्यायन इसे 'मानसिक गुलामी' कहते हैं। क्या यह सही है?... https://youtu.be/cQ9jkepzJiE ऐसी परंपराओं में ही एक परंपरा ज़िंदगी भर की कमाई से पाई-पाई जोड़कर धर्म-कर्म, तीर्थ यात्रा, भागवत कथा है। मरते-मरते भी एक साधारण हिन्दू व्यक्ति की यह ख्वाहिश रहती है कि वह अपना 'अगला जीवन' भी सार्थक करने का इंतजाम करके मरे!..         पर यह ख्वाहिश मात्र इतनी नहीं है। कम से कम जीवन में एक बार वह सामाजिक तौर पर प्रतिष्ठा पा सके, उसके घर नाते-रिस्तेदार आ जाएं, कुछ खान-पान, मनोरंजन हो, यह विचार भी इस परंपरा के साथ जुड़ा है।... क्या यह सब, ये अपूर्ण ख्वाहिशें कोई बु...

कुनिथा लोक-नृत्य

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                                               कर्नाटक का                                     कुनिथा लोक-नृत्य हमारे देश के लोकगीत और लोकनृत्य  जनता की धरोहर हैं।  इन्हें बचाए रखना, इन्हें प्रचारित-प्रसारित करना  हम सबकी ज़िम्मेदारी है।         दरअसल, हमारे लोकजीवन और लोक-संस्कृति को  विकृत करने ,ध्वस्त करने या फिर remix के नाम पर  नष्ट कर देने की प्रक्रिया  उदारीकरण-वैश्वीकरण की शुरुआत के साथ  पिछली शताब्दी में तेज कर दी गई। ... ताकि कम्पनियों की गुलामी के साथ  उनकी उपभोक्ता-संस्कृति को भी  लोग स्वीकार कर लें। ... हम देखते हैं कि  साम्राज्यवादी शक्तियाँ इसमें  काफी हद तक सफल भी हो गई/रही हैं।... कैसे बचेगा हमारा लोकजीवन, हमारी लोक-संस्कृति?  यह सवाल हम सबके सामने है।  हमा...

कर्नाटक की एक पूजा

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                        धर्म-प्राण देश, विचित्र पूजाएं! https://youtu.be/hOW9xNbNnG8 हमारा देश एक धर्म-प्राण देश है! देश के विभिन्न हिस्सों में यहां तरह-तरह के धर्म, भगवान और पूजा-पद्धतियाँ पाई जाती हैं!.. इन सबमें विभिन्नता है, विचित्रता है!.. एकता भी है, एकरूपता भी है!... है न विचित्र? विभिन्नता भी, एकरूपता भी!... तरह-तरह के रंग-रूप और कलात्मकता वाले मंदिरों के साथ भगवान और उनकी पूजाओं के स्वरूप भी विविध-वर्णी हैं! मन्दिरों और भगवान के सामने भिक्षावृत्ति की विचित्र प्रवृत्ति भी जुड़ी है!... पता नहीं क्यों?... आपको पता हो तो टिप्पणी जरूर लिखें!... क्या यह विरोधाभास है?...या इसी का हिस्सा?... यह सदियों का सवाल है!... आज भी है!... ★★★★★

किसानों पर आफ़त

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                                    किसानों पर आफ़त देश की रीढ़ कही जाने वाली हमारी खेती-बाड़ी पर बढ़ता ख़तरा हमारी ज़िंदगी पर, हमारे भविष्य पर मंडराने वाला शायद सबसे बड़ा खतरा है!... पिछले लगभग बीस सालों में उत्तर भारत के हरे-भरे खेतिहर मैदानों में नीलगाय, जंगली सूअर आदि बेतहासा बढ़े हैं। ये जंगली जानवर खेतों को बर्बाद करने के साथ-साथ जब तब इंसानों पर भी हमला करते हैं। आशंका व्यक्त की जा रही है कि सरकारों द्वारा बहुराष्ट्रीय कंपनियों को 'कॉरपोरेट खेती' करने की छूट देने के साथ-साथ किसानों की ज़िंदगी में इस तरह की आफत आई है।  जब अवध के इलाकों में जगह-जगह जंगल-झाड़ियां थीं तब भी इन जानवरों को कहीं नहीं देखा गया था। इनकी जगह पर अनेक दूसरे जानवर जैसे स्याही, सियार-गीदड़, लकड़बग्घे आदि जानवर थे जिनसे कम से कम खेती को कोई खतरा नहीं था।....वे आज कम हो रहे हैं। किंतु ये बड़े जानवर जिनके ठहरने के जंगली इलाके इन क्षेत्रों में प्रायः नगण्य हैं, बढ़ते जा रहे हैं और आये दिन खेती के साथ-साथ इंसानों ...

एक और कर्ण

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                  एक और कर्ण: किसी की तलाश है उसको                             बहुजन नेता कहाँ  रहते हैं? हमारे देश में हर एक को किसी न किसी की तलाश है!... ऐसी ही तलाश शायद पूरी दुनिया को भी हो!... वंचित समाज एक पूरा वंचित देश है, दुनिया है.  इन्हीं वंचितों में से है- एक और कर्ण !... उसे महाभारत के कर्ण की तरह न तो किसी राजा की तरह युद्ध में शामिल किया गया है, न ही उसकी कोई पहचान है. फिर भी वह हर कहीं दिख जाता है: जीवन बचाने का, अस्तित्त्व बचाने का संघर्ष करता हुआ!... एक युद्ध लड़ता हुआ!... महाभारत के कर्ण की तरह उसे दानवीर होने का कोई मुगालता नहीं!किन्तु वह  किसी से भीख भी नहीं मांगता!... वह जीवन जी सकने के एक ऐसे महाभारत में शामिल है जिसमें उसके सहयोगी केवल उसके  मां-बाप हैं. इस महाभारत के कर्ण की जमीन छीन ली गई।...शायद इसीलिए कि वह दलित समाज के कमजोर तबके का है!...उसकी कोई बहनजी या भाईजी, तथाकथित बहुजन-सर्वजन समाज का रानी या राजा ...

नीम का एक देवता

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                                  नीम का देवता                             एक ग्राम देवता की कहानी हमारे ग्राम देवता अनेक रूप धारण कर आते हैं।  इन देवताओं में देवियों के स्वरूप भी हैं और देवों के भी।  ये प्रायः इंसानों के सर पर सवार होकर आते हैं, पर कभी-कभी इनका अवतरण पौधो और जानवरों के रूप में भी होता है। https://youtu.be/7ISEjZDBK_M अलग-अलग इलाकों में वहाँ फैलने वाली बीमारियों, अक्सर आने वाली आपदाओं, अप्राकृतिक मौतों, मौसमी विपत्तियों और न समझ में आई वाली आसमानी या जमीनी हलचलों-हरक़तों के अनुसार इन देवताओं के स्वरूप बनते-बिगड़ते देखे जा सकते हैं। इन देवताओं की भगवानों की तरह कोई निश्चित कहानियाँ या गाथायें नहीं हैं। वे देश-काल के अनुसार निर्मित होती हैं। इनमें अनेक अलौकिक-आध्यात्मिक तत्त्वों के साथ-साथ भूत-प्रेत, पिशाच, बरमबाबा, डायन, डाकिन, चुड़ैल, जिन्न, माई, मूड़कट्टन आदि आधिभौतिक तत्त्वों का अस्तित...

ये किसका घर तोड़ा है तूने?...

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                            ये किसका घर तोड़ा है तूने?                  पानी बिन जाता जनवा तूरि ले मकनवा...            अधिकारियों से अनेक बार अनुनय-विनय करने के बावज़ूद भोजपुरी के लोककवि विनोद मित्रा का घर तोड़ दिया गया!... जब घर तोड़ा जा रहा था विनोद मित्रा बेहोश हो गए! बेहोशी हालात में उन्हें अस्पताल ले जाया गया।...लौटे तो घर की जगह घर का मलवा पड़ा था! बाल-बच्चे बेघर!... उन्हीं मनःस्थितियों में कवि द्वारा यह मार्मिक भोजपुरी लोकगीत लिखा गया। उन्होंने अपनी आपबीती को कुछ इस तरह सुनाया! -- पानी बिन जाता जनवा तूरि ले मकनवा धनवा लूटि ले गइले ना! तड़पे धूप में परनवा धनवा लूटि ले गइले ना!... दिन दुपहरिया के रतिया अंधरिया में संझवा के सखी संग रहले कोठरिया में चोरवा चिकरवा पे कईला विचरवा धनवा लूटि ले गइले ना! तड़पे धूप में परनवा धनवा लूटि ले गइले ना!... सेठ साहूकार मिलि गांव के जमीदरवा हो धरती माता पे कइले बाटे अधिकरवा हो हमके...