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चटपटा सिनेमा नहीं है साहित्य

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                    चटपटा सिनेमा नहीं हो सकता साहित्य                                                                                                           - डॉ. मिश्कात आब्दी                   https://youtu.be/3sGCKR92fw8 चटपटा सिनेमा नहीं हो सकता साहित्य!...उसकी मर्यादाएं अलग हैं. वह जीवन की सर्वांगीण व्याख्या का प्रयास है जबकि सिनेमा का मुख्य काम है- मनोरंजन!...यद्यपि यह सच है कि सिनेमा ज़्यादा जीवंत, ज़्यादा मुखर होता है पर साहित्य की संवेदना और विचार-प्रवणता कहीं ज़्यादा प्रभावशाली और दीर्घकालिक होती है! वह हमारे जीवन का हिस्सा बन जाता है. जबकि सिनेमा का प्रभाव अपेक्षतया अल्पकालिक होता है.      https:/...

क्रांतिवीर संगोल्ली रायण्ण: जानिए इस योद्धा को

                         क्रांतिवीर संगोल्ली रायण्ण:                                जानिए इस योद्धा को   क्या आप क्रांतिवीर संगोल्ली रायण्ण से परिचित हैं?... शायद नहीं!... लेकिन अगर आप भारत देश के निवासी हैं और राष्ट्रीय भावना को सचमुच महत्त्व भी देते हैं तो आपके लिए क्रांतिवीर संगोल्ली रायण्ण के बारे में जानना बेहद जरूरी है!... दरअसल 3 फरवरी, २०१६ को साउथ सेन्ट्रल रेलवे के सिकंदराबाद पब्लिक रिलेशन ऑफिस से एक नोटिफिकेशन जारी किया गया जिसके अनुसार तब तक के बेंगलुरु सिटी रेलवे स्टेशन का नाम बदल कर क्रांतिवीर संगोल्ली रायण्ण रख दिया गया. कर्नाटक के लोगों के लिए तो यह इस मिटटी के एक सपूत को याद करना भर था किन्तु बेंगलुरु रेलवे स्टेशन सुनने-जानने के आदी देश-दुनिया के अन्य लोगों के लिए यह चौंकाने वाला था!...               कौन हैं ये क्रांतिवीर संगोल्ली रायण्ण ?... दक्षिण भारत का पांचवां सबसे व्यस्ततम ...

घंटी-बाबा

                             घंटी-बाबा           https://youtu.be/-HRucq7l3is भक्तों पर संकट बढ़ रहा है.  रोज़ी-रोज़गार संकट में है! उनके पास समय की कमी है.  फुर्सत के वक़्त ही वे सही समय मन्दिर पहुँच पाते हैं.  बड़े-बड़े पढ़े-लिखे भक्त मोबाइल, लैपटॉप, कम्पुटर पर लगे हैं तो साधारण #गरीब #भक्त मेहनत-मजदूरी के बाद मोबाइल पर कुछ समय बिताते हैं. ऐसे में सुबह-शाम #आरती-वन्दना तो बस मौके की बात रह गयी है. पर मन्दिर का काम-काज,#पूजा-अर्चना तो होनी ही है!.... तो मन्दिर में भक्तों की जगह आ गये हैं घंटी-बाबा या मशीन वाले घंटी-बाबा! #पुजारी जी का काम भी आसान हुआ.  कोई तो है साथ देने के लिए!... #जीवन का यही #अंतर्विरोध उसे गति देता है, देता रहेगा!...जो काम हम कर नहीं सकते वह धीरे-धीरे निरर्थक लगने लगेगा! उसे हम छोड़ते जाते हैं। नया काम सीखते हैं, उसमें मन लगाते हैं, उसमें हमारे अपने #मन_की_बात होती है।...और यह केवल हमारे ऊपर नहीं होता बल्कि परिस्थितियों के अंतर्विरोध आपको ...

चैलेंज एक बहुजन का!

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                             चैलेंज एक बहुजन का!--               https://youtu.be/Qq3wqYN36F4 जी हाँ, नहीं मिलती न्यूनतम मजदूरी!... इन मज़दूरों की बातें सुनिए, आक्रोश देखिए!... दिहाडी मज़दूर हैं ये!... कभी इनके साथ काम करके देखिए!... आखिर ये भी इंसान हैं!... अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग निर्धारित की गई है न्यूनतम मजदूरी!... क्यों?...जीवन-स्तर के कारण?.. क्या है किसी भी मज़दूर का जीवन स्तर? खास तौर पर दिहाडी मज़दूर का!.. सरकार से अच्छी तो जनता जिसने 350 से 500 रुपए तक प्रतिदिन दिहाडी की मांग को जायज ठहराया है!... ★★★

वैश्वीकरण: शिक्षा एवं संस्कृति

                      वैश्वीकरण का             शिक्षा एवं संस्कृति पर  प्रभाव https://youtu.be/FokBCE59NDw           ' भूमंडलीकरण और मानव सुरक्षा...'- विषयक संगोष्ठी में भूमंडलीकरण या वैश्वीकरण के दुष्परिणामों/प्रभावों की चर्चा विषय पर आम नागरिक की चिंता प्रकट करती है। विशेषकर, शिक्षा और संस्कृति पर लगातार हो रहे हमलों को इस संगोष्ठी में मिली अभिव्यक्ति ध्यातव्य है!...             देखें, सुनें!... ★★★

हम उत्सवधर्मी!...

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                                  हम उत्सवधर्मी!...               हमारे समाज की यह एक विशेष बात है कि हम अपनी सदियों पुरानी परंपराओं को छोड़ने को तैयार नहीं होते। उससे नुकसान हो या फ़ायदा- हम ज़्यादा नहीं सोचते!...यूरोपीय देशों के लोगों और हममें यह अंतर आसानी से देखा जा सकता है। राहुल सांस्कृत्यायन इसे 'मानसिक गुलामी' कहते हैं। क्या यह सही है?... https://youtu.be/cQ9jkepzJiE ऐसी परंपराओं में ही एक परंपरा ज़िंदगी भर की कमाई से पाई-पाई जोड़कर धर्म-कर्म, तीर्थ यात्रा, भागवत कथा है। मरते-मरते भी एक साधारण हिन्दू व्यक्ति की यह ख्वाहिश रहती है कि वह अपना 'अगला जीवन' भी सार्थक करने का इंतजाम करके मरे!..         पर यह ख्वाहिश मात्र इतनी नहीं है। कम से कम जीवन में एक बार वह सामाजिक तौर पर प्रतिष्ठा पा सके, उसके घर नाते-रिस्तेदार आ जाएं, कुछ खान-पान, मनोरंजन हो, यह विचार भी इस परंपरा के साथ जुड़ा है।... क्या यह सब, ये अपूर्ण ख्वाहिशें कोई बु...

कुनिथा लोक-नृत्य

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                                               कर्नाटक का                                     कुनिथा लोक-नृत्य हमारे देश के लोकगीत और लोकनृत्य  जनता की धरोहर हैं।  इन्हें बचाए रखना, इन्हें प्रचारित-प्रसारित करना  हम सबकी ज़िम्मेदारी है।         दरअसल, हमारे लोकजीवन और लोक-संस्कृति को  विकृत करने ,ध्वस्त करने या फिर remix के नाम पर  नष्ट कर देने की प्रक्रिया  उदारीकरण-वैश्वीकरण की शुरुआत के साथ  पिछली शताब्दी में तेज कर दी गई। ... ताकि कम्पनियों की गुलामी के साथ  उनकी उपभोक्ता-संस्कृति को भी  लोग स्वीकार कर लें। ... हम देखते हैं कि  साम्राज्यवादी शक्तियाँ इसमें  काफी हद तक सफल भी हो गई/रही हैं।... कैसे बचेगा हमारा लोकजीवन, हमारी लोक-संस्कृति?  यह सवाल हम सबके सामने है।  हमा...