आत्मलाप-4 : हे बादशाहों
हे बादशाहों!...
-अशोक प्रकाश
हे बादशाहों,
आओ!
मेरा बचा-खुचा मांस ले जाओ
रखवालों ने ही
मेरी बोली लगाईं है...
आओ, आओ, आओ!
सबसे पहले
मेरे दिमाग को खाओ
आँखे फोड़ दो दोनों
ताकि न हो थोड़ा भी दर्द
कुछ भी देख सकने का
मेरे सपनों को चाट जाओ!
तुम्हें मेरा गला
मीठा लगता है क्या?
वहां सप्तम सुर बसते हैं,
दोनों हाथों से दबा दो
ध्यान मत दो
मेरी चीखों पर
वे बड़ी खतरनाक हैं
उन्हें सूरज की तरह
निगल जाओ!
मेरे ह्रदय के बारे में
मत सोचो
वह तो वैसे भी
तुम्हारे इशारों पर धड़कता है
ऊंची-नीची होतीं धड़कनें
तुम्हारे जादुई पम्प से चलती हैं
अगर कुछ दिखें वहां
कतरा-कतरा लहू की बूँदें
बटोर कर ले जाओ!
मेरा पेट सचमुच
बहुत बड़ा है
सब कुछ
खा और पचा जाता है
थोड़ा सा अन्न
हांड़ी में पके हुए भात के
कुछ कण
वहां बचे हैं
खुरच कर निकाल लो
बारूद बन सकते हैं वे
जैसे हड़प चुके हो
रत्नगर्भा जानकर
सारी धरती
समुद्र का सारा जल
इसे भी
हड़प जाओ!
पेट के नीचे
नहीं होता जननांग
दिमाग में होता है
जननांग के पीछे
क्यों पड़े हो?...
दिमाग तो पहले ही
खा चुके हो
हो सके तो
खा जाओ
अपनी ही माँ की कोख
खाओ और गाओ!
मेरे पैर
रस्सियों से बंधे हैं
अभी भी
वे केवल रामधुन पर
थिरकते हैं
थरथराते हैं नागों को देखकर
टूट सकती हैं रस्सियाँ
ध्यान रखना
मेरे कटे पैर भी
पहचान लेते हैं अपना रास्ता
जाओ...
उन रास्तों पर
पहाड़ चिपकाओ
जंगल बिछाओ!
अब क्या चाहिए?
देखो, मेरे बाद
वहाँ बची है
केवल थोड़ी सी आग
लोगे?....
भस्म हो सकते हो
तुमसे नहीं होगा,
दलालों को बुलाओ!...
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