वाह!:


                                डिज़िटल उपवास
                                     
                                          प्रस्तुति: सिद्धार्थ सिंह


             सवेरे से मित्र को चार पांच बार फोन किया । लेकिन उसका फोन उठ ही नहीं रहा था। व्हाट्सएप और फेसबुक पर भी मैसेज किया लेकिन कोई जवाब नहीं।मुझे चिंता हो गई आखिर दोपहर बाद रहा नहीं गया। मैं नजदीक ही रहने वाले  मित्र के घर पहुंच गया।...
            देखा तो श्रीमान गार्डन में एक पुस्तक लेकर बैठे हुए थे।मैं जाते ही बरस पड़ा-
        " सुबह से तुम्हें  फोन कर रहा हूं, मैसेज भी कर रहा हूं ...लेकिन तुम्हारा कोई जवाब ही नहीं मिल रहा! ....क्या बात है ?तबीयत तो ठीक है ?"
       मित्र ठठाकर हंस पड़ा और बोला-
             'भाई मेरा आज उपवास है!... इसलिए फोन पर तुमसे बात नहीं कर सका!"
        मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ!- "यार उपवास में खाना नहीं खाते हैं,  व्रत रखते हैं!... लेकिन फोन पर तो बात कर सकते हैं!..."
         उसने हंसते हुए कहा - "आज मेरा डिजिटल उपवास है! हफ्ते में एक दिन के लिए मैंने निश्चय किया है कि ना तो किसी से फोन पर बात करूंगा, न फेसबुक अपडेट करूंगा, न व्हाट्सएप चैट करूंगा, न ही गूगल लिंक या कोई और सोशल साइट ही देखूंगा।....इसे मैंने डिजिटल उपवास का नाम दिया है। सही कह रहा हूं आज का दिन मेरा बहुत ही बढ़िया गुजरा! न फोन की घंटी और ना समय की कमी! ...देख कितने दिन हुए 'महा-समर' का पहला खण्ड पढ़ने की इच्छा थी! आज इसे शुुरू कर सका हूं!..."
             इतने में भाभी चाय बना कर ले आईं! बोलीं- "भाई साहब आज तो कमाल हो गया! शाम को हमारा पिक्चर देख कर कुछ खरीददारी करने का विचार है! और इनके इस डिजिटल उपवास ने मुझे  कितनी खुशी दी है! मैं आपको बता नहीं सकती!..."
             गज़ब! आज तक मेरे दिमाग में भी कभी यह नायाब आइडिया नहीं आया! वाह!!
             अब मैंने भी निश्चय किया है कि कम से कम हफ़्ते में
एक दिन डिजिटल उपवास करूंगा!
            आप भी करके देखिए! मज़ा आएगा!... सबको करना चाहिए ताकि कम से कम एक दिन तो अपने परिवार को समय दे सकेंगे!
             और हाँ!...पैसे भी बचेंगे!

                                         🔺🔺 🔺🔺

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

नियमकाल में बुलडोजर के नियम

हम देश, हमारा देश- 1: ऐ बनारसी विकास

कार्ल मार्क्स, मार्क्सवाद और उनके विरोधी