नया साल-2018:
नव-वर्ष की शुभकामनाएं!
कुछ भावनाएं:
सोहन लाल द्विवेदी-
स्वागत! जीवन के नवल वर्ष
आओ, नूतन-निर्माण लिए
इस महाजागरण के युग में
जाग्रत जीवन-अभिमान लिए;
दीनों-दुखियों का त्राण लिए
मानवता का कल्याण लिए,
स्वागत! नवयुग के नवल वर्ष!
तुम आओ स्वर्ण-विहान लिए।
संसार क्षितिज पर महाक्रान्ति
की ज्वालाओं के गान लिए,
मेरे भारत के लिए नई
प्रेरणा नया उत्थान लिए;
मुर्दा शरीर में नए प्राण
प्राणों में नव अरमान लिए,
स्वागत! स्वागत! मेरे आगत!
तुम आओ स्वर्ण-विहान लिए!
युग युग तक पिसते आए
कृषकों को जीवन-दान लिए,
कंकाल-मात्र रह गए शेष
मजदूरों का नव त्राण लिए!
श्रमिकों का नाव संगठन लिए,
पददलितों का उत्थान लिए;
स्वागत!स्वागत! मेरे आगत!
तुम आओ स्वर्ण-विहान लिए!
सत्ताधारी साम्राज्यवाद के
मद का चिर-अवसान लिए,
दुर्बल को अभयदान,
भूखे को रोटी का सामान लिए!
जीवन में नूतन क्रांति लिए
क्रांति में नए-नए बलिदान लिए,
स्वागत! जीवन के नवल वर्ष
आओ, तुम स्वर्ण-विहान लिए! ■ ◆
फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़'-
ऐ नए साल बता, तुझमें ऐसा नयापन क्या है,
हर तरफ़ ख़ल्क़ ने क्यूँ शोर मचा रक्खा है।
रौशनी दिन की वही, तारों भरी रात वही,
आज हम को नज़र आती है हर इक बात वही।
आसमाँ बदला है, अफ़सोस, ना बदली है ज़मीं,
एक हिंदसे का बदलना कोई जिद्दत तो नहीं।
अगले बरसों की तरह होंगे क़रीने तेरे,
किस को मालूम नहीं बारह महीने तेरे।
जनवरी, फ़रवरी और मार्च पड़ेगी सर्दी,
और अप्रैल, मई, जून में होगी गर्मी।
तेरा मन दहर में कुछ खोएगा, कुछ पाएगा,
अपनी मीआद बसर कर के चला जाएगा।
तू नया है तो दिखा सुबह नयी, शाम नयी,
वरना इन आँखों ने देखे हैं नए साल कई।
बे-सबब देते हैं क्यूँ लोग मुबारकबादें,
ग़ालिबन भूल गए वक़्त की कड़वी यादें।
तेरी आमद से घटी उम्र जहाँ में सब की,
'फ़ैज़' ने लिक्खी है यह नज़्म निराले ढब की।
............................
अर्थ:
(ख़ल्क़ - मानवता)
(हिंदसे - संख्या; जिद्दत - नया-पन)
(अगले - पिछले/गुज़रे हुए; क़रीने - क्रम)
(दहर - दुनिया; मीआद - मियाद/अवधि)
(बे-सबब - बे-वजह; ग़ालिबन - शायद)
(आमद - आना; ढब - तरीक़ा) ■■
ख़लील धनतेजवी-
अबके बरस भी किस्से बनेंगे कमाल के,
पिछला बरस गया है कलेजा निकाल के।
अपनी तरफ से सबकी दलीलों को टाल के
मनवा ले अपनी बात को सिक्का उछाल के।
माना कि ज़िन्दगी से बहुत प्यार है मगर
कब तक रखोगे काँच का ये बरतन सँभाल के।
ये खत किसी को खून के आँसू रुलाएगा
कागज़ पे रख दिया है कलेजा निकाल के।
ऐ मीर-ए-कारवाँ मुझे मुड़कर ना ददख तू
में आ रहा हूँ पाँव से कांटे निकाल के।
तुमको ये नया साल मुबारक़ हो दोस्तों
मैं जख़्म गिन रहा हूँ अभी पिछले साल के। ■■
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना-
नये साल की शुभकामनाएँ!
खेतों की मेड़ों पर धूल-भरे पाँव को,
कुहरे में लिपटे उस छोटे-से गाँव को,
नए साल की शुभकामनाएँ!
खेतों की मेड़ों पर धूल-भरे पाँव को,
कुहरे में लिपटे उस छोटे-से गाँव को,
नए साल की शुभकामनाएँ!
जाते के गीतों को, बैलों की चाल को,
करघे को, कोल्हू को, मछुओं के जाल को,
नए साल की शुभकामनाएँ!
करघे को, कोल्हू को, मछुओं के जाल को,
नए साल की शुभकामनाएँ!
इस पकती रोटी को, बच्चों के शोर को,
चौंके की गुनगुन को, चूल्हे की भोर को,
नए साल की शुभकामनाएँ!
चौंके की गुनगुन को, चूल्हे की भोर को,
नए साल की शुभकामनाएँ!
वीराने जंगल को, तारों को, रात को,
ठण्डी दो बन्दूकों में घर की बात को,
नए साल की शुभकामनाएँ!
ठण्डी दो बन्दूकों में घर की बात को,
नए साल की शुभकामनाएँ!
इस चलती आँधी में हर बिखरे बाल को,
सिगरेट की लाशों पर फूलों-से ख्याल को,
नए साल की शुभकामनाएँ!
सिगरेट की लाशों पर फूलों-से ख्याल को,
नए साल की शुभकामनाएँ!
कोट के गुलाब और जूड़े के फूल को,
हर नन्ही याद को, हर छोटी भूल को,
नये साल की शुभकामनाएँ!
हर नन्ही याद को, हर छोटी भूल को,
नये साल की शुभकामनाएँ!
उनको जिनने चुन-चुनकर ग्रीटिंग कार्ड लिखे,
उनको जो अपने गमले में चुपचाप दिखे,
नये साल की शुभकामनाएँ! ●◆●
उनको जो अपने गमले में चुपचाप दिखे,
नये साल की शुभकामनाएँ! ●◆●
राम जियावन दास बावला-
बसल बयार रितुराज के सनेस देत
गोरकी चननिया के अँचरा गुलाल हो।
खेत खरिहान में सिवान भर दाना
चिरई के पुतवो न कतहूँ कंगाल हो।
हरियर धनिया चटनियां टमटरा के
छिमिया मटरिया के गदगर दाल हो।
नया नया भात हो सनेहिया के बात हो
एही बिधि शुभ शुभ शुभ नया साल हो।।
★★★★
★★★★

We celebrate blind new years every year blindly!!!
ReplyDeleteThe New Year is not blind.It could be celebrated 'blindly'!...
Deleteनववर्ष की कविताएं हृदय स्पर्शी है , प्रणाम नमन वंदन अभिनंदन ।. ........... डॉ.मोरमुकुट शर्मा अलीगढ़
Delete