शिक्षा की अनोखी रोशनी:
शेख़ फ़ातिमा:
एक अनोखी शिक्षक
-अशोक प्रकाश
आज यह बड़ी साधारण बात लग सकती है!...दलित-मुस्लिम लड़कियों का पढ़ना-लिखना, बड़े-बड़े पदों को सुशोभित करना-आज यह सब कोई अजूबी बात नहीं लगती।यद्यपि आज भी वास्तव में यह बिल्कुल आम बात नहीं है। खासकर, गरीब घरों की लड़कियों के लिए पढ़ाई-लिखाई आज भी एक मुश्किल काम है। एक तरफ आर्थिक मसले तो दूसरी तरफ सामाजिक सोच का अभी पिछड़ा होना, अभी भी दलित-मुस्लिम लड़कियों को बड़ी संख्या में स्कूल से दूर रखता है।...ऐसे में हम समझ सकते हैं कि आज से 150 साल पहले दलित-मुस्लिम ही नहीं बल्कि आम तौर पर लड़कियों को स्कूल भेजने के बारे में समाज की क्या सोच रही होगी!...
आज से कहीं पिछड़े 150 साल पुराने हिंदुस्तानी समाज में लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई सचमुच एक सपना थी। अंग्रेज़ी औपनिवेशिक गुलामी निश्चित ही इस देश के लिए एक अभिशाप थी, लेकिन अपने फ़ायदे के लिए ही सही-अंग्रेज़ पढ़ने-लिखने की ऐसी पद्धति यहां विकसित कर गए जिसका आगे की पीढ़ियों ने फायदा उठाया।
यहां प्रसंग सावित्रीबाई फुले की साथी शिक्षिका फ़ातिमा शेख़ द्वारा लड़कियों की शिक्षा के लिए किए गए अनूठे योगदान का है। हम सब जानते हैं कि पिता और समाज के असहयोग और विरोध के बावज़ूद ज्योतिराव फुले ने दलितों-गरीबों के लिए शिक्षा की बुनियाद रखी, स्कूल खोले, उनमें पढ़ने के प्रति ललक पैदा की। डॉ.अम्बेडकर जैसे लोगों का सुशिक्षित होकर समाज-देश को नई राह दिखाने का सपना पूरा होना इसी कारण संभव हुआ। लेकिन ज्योतिराव फुले ने केवल पिछड़े तबकों में शिक्षा का प्रचार-नहीं किया, बल्कि उन्होंने महिलाओं की शिक्षा के लिए भी सावित्रीबाई फुले को तैयार कर एक नई रौशनी की खिड़की खोलने का भी काम किया।
फ़ातिमा शेख सावित्रीबाई फुले की अभिन्न सहयोगी थीं। वे ज्योतिराव फुले के दोस्त उस्मान शेख की बहन थीं। उस्मान वे शख़्स थे जिन्होंने पिता गोविंदराव और निकृष्ट समाज द्वारा ठुकराए गए ज्योतिराव को न केवल अपने घर मे रहने की जगह दी, बल्कि शिक्षा के उनके अभियान में सहयोग करने लिए अपनी बहन फ़ातिमा को भी तैयार किया। वे पूना के गंज पीठ में रहते थे।कुछ दिनों बाद इसी घर के परिसर में 1848 ई. में विद्यालय खोलकर सावित्रीबाई और फ़ातिमा शेख ने लड़कियों को भी पढ़ने के लिए प्रेरित किया। बाद में उनका साथ सुगना बाई नामक एक अन्य महिला ने दिया जो 1856 के बाद इस मिशन को आगे बढ़ातीं रहीं!यह वह दौर था जब दकियानूसी समाज लड़कियों को पढ़ाई करने में अपनी तौहीन समझता था, अपनी इज़्ज़त पर ख़तरा महसूस करता था। फ़ातिमा शेख ने इन विषम परिस्थितियों में मुस्लिम लड़कियों को पढ़ने के लिए तैयार किया। उन्होंने बड़ी कठिनाई से उनके घर के लोगों को लड़कियों की शिक्षा की महत्ता समझाई और लड़कियों को इस नई रोशनी के आकर्षित किया।
हमारे देश में ही नहीं, पूरी दुनिया में मानव-सभ्यता को विकसित करने में अपनी ज़िंदगी बिताने वालों, इसके लिए क़ुर्बान हो जाने वालों की अनंत कहानियाँ दफन हैं। इतिहास सिर्फ़ राजाओं-महराजाओं, नवाबों-शहंशाओं का लिखा जाता रहा है। अप्रतिम महिला, शिक्षिका फ़ातिमा शेख़ के बारे में भी इसी कारण ज़्यादा जानकारी नहीं मिलती। इतना कहा जाता है कि जब सावित्रीबाई और फ़ातिमा निकलतीं तो दकियानूसी समाज के लोग लड़कियों को पढ़ाई में उतारने के कारण उन पर पत्थर और गोबर फेंकते। लेकिन इसके बावजूद ये दोनों दलित-मुलिम-गरीब महिलाओं की अमूल्य धरोहर अपने मिशन को आगे बढ़ाती रहीं!
ऐसी महान शख्सियत को सलाम करने को बार-बार जी करता है।
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