शख़्सियत (अलीगढ़): गोपाल दास 'नीरज'



                               गोपालदास 'नीरज'


खुशबू-सी आ रही है इधर ज़ाफ़रान की,
खिड़की खुली है ग़ालिबन उनके मकान की

हारे हुए परिन्दे ज़रा उड़ के देख तो,
आ जायेगी ज़मीन पे छत आसमान की

बुझ जाये सरेशाम ही जैसे कोई चिराग़,
कुछ यूँ है शुरुआत मेरी दास्तान की

ज्यों लूट लें कहार ही दुल्हन की पालकी,
हालत यही है आजकल हिन्दोस्तान की

औरों के घर की धूप उसे क्यूँ पसंद हो
बेची हो जिसने रौशनी अपने मकान की

जुल्फ़ों के पेंचो-ख़म में उसे मत तलाशिये,
ये शायरी जुबां है किसी बेजुबान की

'नीरज' से बढ़कर और धनी कौन है यहाँ,
उसके हृदय में पीर है सारे जहान की!..
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