उच्च शिक्षा- 6: यूजीसी



                             यूजीसी की यशोगाथा
                                           प्रस्तुति- डॉ अरुण कुमार

अद्भुत है यूजीसी और इसके कर्ता-धर्ता । अभी ‘वेद’ से इसका पिंड छूटा ही था कि वज्रधारी धीर-गंभीर ‘इन्द्र’ ने आसन जमा लिया। आते ही स्वभावानुकूल एक केंद्रीय नेता के भाई की नियुक्ति कर सरकार में अपनी आस्था दिखाई और चिड़िया की आँख पर निशाना साधा। सचिव पद की नियुक्ति के लिए लंबी चौड़ी सूची तो बनाई पर अंतिम सूची में पुराने यार-दोस्त ही स्थान बना सके। पारदर्शिता के साथ काम करना इनका पुराना शगल है जो यहाँ भी जारी है। बी एच यू में अपने शोध-अनुभव के आधार पर सुघड़तम नियुक्ति करने वाले चेयरमैन ‘धीर-गंभीर-इन्द्र’ सचिव-नियुक्ति में भी कलाकारी कर गए हैं। सुनने में आया है कि कोई ओशो ‘जैन’ दौड़ में सबसे आगे हैं। नशीली रात के लिए मशहूर शहर इंदौर के वासी जैन इनके पुराने यार हैं जिनके प्रति इनका स्नेह-दुलार जग जाहीर है। पहले भी नियम के विपरीत ‘जैन’ को ये पदोन्नति दे चुके हैं और यहाँ उनको पदस्थापित करने के लिये कमर कस लिए हैं। अव्वल तो ‘जैन’ का सूची में आना ही आश्चर्यजनक है चयन तो दूर की बात होती। पर अध्यक्ष बनने के बाद ही लोगों ने यह कयास लगाना शुरू कर दिया था कि अब कौन लोग ,बहादुर शाह जफर मार्ग’ पर तफरी करेंगे। पिच्छले दिनों बीएचयू के दो ‘एक्सीलेंस’ प्रोफेसर भारतेन्दु और रघुवंशी यूजीसी के ‘मोस्ट-वांटेड’ प्रोफेसर नामित हुए।  संस्थान में सचिव पद अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। अत: ‘धीर-गंभीर-इन्द्र’ को इस पद पर अपने किसी पुराने यार को बैठाना जरूरी था। सचिव पद के लिए बनी ‘छंटनी-समिति’ ने भी भविष्य में भी अपने आवागमन को सुगम बनाने केलिए ‘परमादेश’ के अनुरूप ही सूची बनाई। इससे ‘धीर-गंभीर-इन्द्र’ का कार्य आसान हो गया। विशेषज्ञ समिति में तो आजकल ‘थाली-के-बैगन’ ही रखे जाते हैं। क्योंकि इनसे आस्थावान लोग इस ‘स्वर्णगर्भा’ जफर मार्ग पर मिलेंगे नहीं। परधान सेवक ने भी अपना फरमान सुना ही दिया है कि विश्वविद्यालयों से निकालने वाले प्रोफेशनल्स ‘पकौड़ा’ तलें और अपनी प्राचीन  थाती (‘स्किल’) को वैश्विक स्तर पर स्थापित करें ।  यदि ऐसा न होता तो ‘धीर-गंभीर-इन्द्र’ जैसे ‘पकौड़ा-विशेषज्ञ’ को उस कुर्सी पर क्यों बैठाते जिस पर कभी डी एस कोठारी बैठ चुके हैं। न विश्वास हो तो ‘धीर-गंभीर-इन्द्र’ के सीवी(CV) को खंगाल डालिए।  न तो ‘शोध’ दिखेगा न ही ‘शोध-पत्र’! हर तरफ ‘पकौड़े’ की गंध मिलेगी। पर इस पकौड़े का असल स्वाद तो तब मिलेगा जब ओशो-जैन सचिव पद पर ‘धीर-गंभीर-इन्द्र’ के सहयोग से एक-दो दिन में आसन ग्रहण करेंगे। ‘यथा नामो तथो गुण:। ये ‘विशाखा गाइडलाइन’ पर भी काम कर चुके हैं जिसकी अनुगूँज इंदौर के चौक-चौराहे पर सुनाई देती है। तो आइये हम सब मिलकर इस परम पवित्र जोड़ी (‘धीर-गंभीर-इन्द्र’ और ‘ओशो-जैन’) का स्वागत करे और गाये ‘हरे कृष्णा हरे ’!
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