ग़ज़ल:


                सूरज नहीं तो शम्मा जलाने की बात कर
 
                                                      - गौहर रज़ा

सूरज नहीं तो शम्मा जलाने की बात कर
ज़हनों में, दिल में ज्योत जगाने की बात कर 

ज़िक्रे-ए-ख़िज़ान तो हो चुका, ज़िक्रे बाहर कर
अक्स-ए-ख़याल-यार बचाने की बात कर 

मेरा वतन जो जेल की सूरत में ढल गया 
उसको बहिश्त फिर से बनाने की बात कर 

अब नस्ल-ए-नौ भी माँग रही है हिसाब, सुन
अपनी नहीं, तू आज ज़माने की बात कर

दिल से ज़हन का राबता जब टूटने लगे 
दिल में नए ख़याल जगाने की बात कर

पाबंदियाँ हों शर्त तो आवाज़ कर बुलंद 
जाम-ओ-सुबू की, पीने पिलाने की बात कर

अब मर्सियों का दौर नहीं है मेरे नदीम
नग़मे बिखेर, साज़ मिलने की बात कर 

दिल में उमंग, हाथ में परचम लिए हुए
पैमान-ए-इनकिलब, निभाने की बात कर।
                                                      ■■■
                             9.2.2018

Comments

Popular posts from this blog

अम्बेडकरवाद से बड़े अम्बेडकरवादी?..

हम देश, हमारा देश- 1: ऐ बनारसी विकास

नियमकाल में बुलडोजर के नियम