आत्मालाप-6: घर वापसी

                       

                                      घर-वापसी
                                    
                                              -अशोक प्रकाश

घर की
याद आती है
वापस जाना चाहता हूँ
रोज़ी-रोटी दोगे?...
वहीं रहना चाहता हूँ!

कहाँ रहने पाया
मैं वहाँ...
दर-दर की ठोकरें खाई
खिंचा आया यहाँ!

कैसे हो
वापसी घर की
कहते हो...
मारा भगाया पहले
अब यहाँ भी नहीं रहने 
देते हो!

फिर बेगारी लोगे?
उल्लू समझते हो...
जब जो चाहे
बकते हो?

कहते हो हिन्दू हो
सौ करोड़ हो तो 
उन्हें तो शिक्षा, रोज़गार...
भ्रष्टाचार-रहित शासन दो!

बरगलाता है तू...
मकड़जाल में जो फंसा
दुश्मनी उसी से
निभाता है तू!

तेरे असली शिकार 
वही होते हैं,
धर्म के नाम पर जो
तेरी गुलामी ढोते हैं!...

                                       ★★★★★

Comments

Popular posts from this blog

नियमकाल में बुलडोजर के नियम

हम देश, हमारा देश- 1: ऐ बनारसी विकास

कार्ल मार्क्स, मार्क्सवाद और उनके विरोधी