जनता का इतिहास:

       
                         पाहीमाफी की प्रभुदेई

                                              -आशाराम जागरथ

                     
             
         
         जीवन कहां- कहां  और कैसे-कैसे धड़कता है, किसको  कब-कहाँ ले जाता- इसके अहसास के लिए इस पोस्ट को जरूर पढ़िए! 70 कुछ ज़्यादा होते हैं क्या?...नहीं, जैसे कल की बात हो!...बहुत कुछ बदला है! सब अच्छा ही हुआ है क्या?...जी नहीं, पर जनता का इतिहास ऐसे ही बनता है!
ज़माना और बदलेगा!...यह दुनिया भी- विश्वास कीजिए और बेहतर होगी!...
 'अच्छे दिन आएंगे, जरूर आएंगे!'...
वे नहीं, आप लाएंगे...आपके बच्चे लाएंगे!!...

            ये हैं पाहीमाफी की प्रभुदेई ।  इनका जन्म रंगून में हुआ था । पिता मधाऊ आजाद हिन्द फौज में थे । द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान जर्मनी की हार के बाद आजाद हिंद फौज के सिपाहियों में भगदड़ मच गयी। चांदी का रुपया कमर में बाँधकर सिपाही मधाऊ पत्नी और बेटी प्रभुदेई को लेकर रंगून से पैदल ही चल पड़े । ऊबड़-खाबड़ पथरीली -पहाड़ी रास्ते में गठरी व सर -सामान के बोझ से दबी प्रभुदुई की माँ से चल पाना दूभर हो रहा था । आखिरकार उन्होने अपना सारा सामान और बच्ची (प्रभुदेई) को छोड़कर पति मधाऊ के पीछे-पीछे चलने लगीं । लगभग 3 किमी का रास्ता तय करने के बाद मधाऊ ने पूछा कि बच्ची कहाँ है तो उन्होंने बताया कि चला नहीं जा रहा था सो गठरी-मोठरी व बच्ची के पीछे छोड़ आई हैं । मधाऊ ने डाँटा और पत्नी को वहीं बिठाकर बच्ची को लेने वापस गये । बच्ची सही सलामत थी । कहते हैं कि वे रंगून से पाहीमाफी 6 महीने में पहुँचे थे । मेरे बाबा भागीरथी  भी मधाऊ के साथ ही रंगून से आये थे। पिता जी बताते हैं कि 6 महीने में लम्बी -लम्बी दाढ़ी हो गयी थी।
 बचपन में मधाऊ दादा रंगून के संस्मरण सुनाते हम बच्चे अनसुना कर देते । आज एक कसक है कि काश उनके संस्मरणों को ध्यान से सुने होते ।  मुझे याद है जब वे बताते थे कि रंगून से भागने के दौरान सारा दिन चलने के बाद शाम  को किसी गाँव मे जाते तो बताते कि वे अयोध्या निवासी हैं तो उनकी बड़ी आवभगत होती ।

मधाऊ दादा के  बोरसी की आग कभी बुझती नहीं थी। टोले में हम कंडी लेकर माँगने जाते ।  कभी -कभी हम खाली लौट आते तो माँ कहतीं कि जाके सिपाही के यहाँ से ले आओ । सिपाही (मधाऊ) आग देते ,मगर सौ बात सुनाने के बाद। "रोजै रोज दउरा चला आवअ थ्या । आग नाहीं जियाय पउत्या" फिर वो बोरसी खोदकर आग का एक टुकड़ा दे देते । मधाऊ के यहाँ आग माँगने बहुत मजबूरी में ही जाते ।  

प्रभुदेई की माँ नइका के नाम से जानी जाती थीं। गोरी, पतली और सुन्दर । लेकिन कर्कश स्वभाव। गाँव की औरतें उन्हें 'कठकरेजी महतारी' कहती थीं । 

प्रभुदेई का विवाह पहले हेंगवापुर में हुआ था । बड़ी बेटी निर्मला वहीं की है । लेकिन ससुर की मर्जी के खिलाफ एक बार नैहरे क्या चली आईं कि दुबारा कोई ससुराल से लेने ही नहीं आया । सालों अगोरने के बाद मजबूरन अरखापुर में  धरउवाँ पठई गयीं । आज कल वे भार बारती   हैं और भूजा भूजती हैं । 

बदलू और भगवती दो भाई के बीच एक धरउवाँ मेहरारू थी। दोनों बारी - बारी से बम्बई कमाने जाते थे। जिसकी बारी गाँव में रहने की होती वही उस मेहरारू का पति होता । गाँव के पदे वो मेरी भाभी लगती थीं । मुझसे चिट्ठी लिखवने आती थीं । सास से खूब झगरा होता था । पाहीमाफी गाँव घाघरा नदी के कटान में कट जाने के बाद अंततः बड़े ( बदलू ) को ही  final पति मानने का निर्णय लिया । परन्तु ये बहुत दिन चल न सका और एक दिन जहर खाकर उन्होनें अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली । 

भगवती कलकत्ता से मेहरारू लाये । कुछ दिन रहने के बाद उसी के साथ कलकत्ते गये थे । मगर 25 साल हो गये कुछ लता-पता नहीं है। बदलू अपने ससुराल में हैं । प्रभुदेई बताती हैं कि वो भी अब खोज खबर नहीं लेते हैं।

प्रभुदेई अब लगभग 75 की हैं । एक अरसे बाद कल ग्राम अरखापुर , चिलमा , बस्ती में उनसे मुलाकात हुई।...■■■

                               

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