केदारनाथ सिंह


                                   बुनाई का गीत

                                               - केदारनाथ सिंह

उठो सोये हुए धागों
उठो
उठो कि दर्जी की मशीन चलने लगी है
उठो कि धोबी पहुँच गया घाट पर
उठो कि नंगधड़ंग बच्चे
जा रहे हैं स्कूल
उठो मेरी सुबह के धागो
और मेरी शाम के धागों उठो

उठो कि ताना कहीं फँस रहा है
उठो कि भरनी में पड़ गई गाँठ
उठो कि नाव के पाल में
कुछ सूत कम पड़ रहे हैं

उठो
झाड़न में
मोजो में
टाट में
दरियों में दबे हुए धागो उठो
उठो कि कहीं कुछ गलत हो गया है
उठो कि इस दुनिया का सारा कपड़ा
फिर से बुनना होगा
उठो मेरे टूटे हुए धागो
और मेरे उलझे हुए धागो उठो

उठो 
कि बुनने का समय हो रहा है... ★★★

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