उनका दर्द: किसानी संवाद


                                  किसानी-संवाद
   
                                               प्रस्तुति : अशोक प्रकाश


          खेती-किसानी राजनीति से ही नहीं, बुद्धिजीवियों-लेखकों के दिल-दिमाग से भी जैसे गायब होती जा रही है। यह अनायास नहीं है। यह एक ऐसा सायास फ़रेब है जिसकी कीमत सदियों को चुकानी पड़ सकती है। क्योंकि विकास की रफ्तार की जितनी और जैसी गति किसानों की रगों तक पहुंच पा रही है वह उसे स्वस्थ बनाने की जगह अस्वस्थ ही बना रही है। खाद-बीज-पानी-जुताई-बुआई सब पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का कब्ज़ा होते जाने से किसान इनका एक उपभोक्ता मात्र बनकर रह जा रहा है। यह बहुत घातक और दूरगामी परिणाम वाला कुचक्र है। समझा और रोका जाना चाहिए इसे!
            फेसबुक-मित्र मोती लाल और अन्यत्र इससे संबंधित कई संवाद इधर चले हैं जो इन चिंताओं से हमें रूबरू कराते हैं। यहाँ उन्हीं में से कुछ संवाद साभार पेश किए जा रहे हैं:



  ★  "एक पुरुष भीगे नयनों से,देख रहा था प्रलय प्रवाह।...
मेरे पूज्य पिताजी ।जिनके वास्तविक जीवन की अधिकतर घटनाएँ और चरित्र 'गोदान' के होरी से मिलती हैं।भोला की शादी जैसे वादे भी।यथार्थ होते हुए।प्रायः 'पूस की रात' घटित होती है।खेती उनकी माँ है ,और खेत बाप।तीसरा पूजनीय कोई नहीं है।खेत में फसलों के बीच न सोंएँ,तो उन्हें नीद नहीं आती।पढ़े लिखे मेरे मझले भाई के साथ एकबार वैष्णव दर्शन को गये तो रास्ते भर उन्हें गरियाते रहे--साला पढ़ लिखकर भी गोबर है।बताओं कहीं ईंट पत्थर में भी भगवान होते हैं।अरे!मैं बिना पढ़े भी दावा करता हूँ कि भगवान ,अन्न में हैं।न विश्वास हो तो शर्त लगा लो।परन्तु इस साल पस्त हैं।और भी होते जा रहे हैं।सरकार की नजर में कारण कुछ खास नहीं है।वजह बस इतनी है कि इस वर्ष दो बीघे की अरहर में दो किलो भी मिलने की उम्मीद नहीं है।सब गयी नीलगाय के पेट में।सरकारें जब तक " गाय" कहकर किसानों से पुजवाती रहेंगी तब तक किसान यूँ ही मरता रहेगा। पिताजी,शायद रूपा की शादी इस साल न कर पाएँ क्योंकि गेंहूँ की फसल पककर भीग गयी है,सड़ गयी है।वे राष्ट्रभक्त भी नहीं हैं कि सांसदों की भाँति आजीवन पेंशन की उम्मीद करें।परन्तु मेरा दावा है कि सूखी रोटी खानेवाले इन्हीं लोगों में मेहनत और मनुष्यता बची है।उनसे हाथ मिलाते ही बड़े बड़े जवानों के हाथ खट्ट से टूट जाते हैं।पिताजी मुझे आपकी सूखी रोटी पर गर्व है।"....                                  - मोती लाल

 ★  "आप बिल्कुल सही कहें हैं सर जी.. जैसे होरी अपनी मरजाद के लिए खेती से अपने को जीवन के अन्तिम क्षण तक जुड़े रहता है वह इसलिए की वह जानता है, कि वही उसकी शान है,भले उससे लाभ हो या हानि,पर अलग नहीं होता।..किसानों के श्रम से ही समाज और देश चलता है, यह बात हमें ध्यान में रखना होगा.." 
                                         - अतुल केसरवानी

★  "सब पूस की रात में नीलगाय चर रही है।बचने पाए तब तो खिलाएँ।फिर अगली बार आपको जरूर देंगे।वादा।"...
                                         - मोती लाल

"एक पुरुष भीगे नयनों... ।दुखवा मै कासो कहूँ मोर सजनी ! किसानों के प्रति सरकार और प्रकृति की मार चिन्तनीय है  । हर किसान की सोच ,समझदारी और जांगर का मुरीद हूँ!..."                                          - अवनीश यादव

★     "होरी कब तलक रहेगा अचेत खेत में?
          धनिया क्या पछाड़ खाती रहेगी रेत में?
          गोबर कब तलक भूखा फिरेगा नगर में?
          क्या यही हाल होगा घर घर में?
          गो रक्षा के नाम पर कब तलक कटेगा किसान, 
          कब तक दमन की चक्की पिसेगा इंसान?"
                                      - रवि कुशवाहा

★   "किसान की चाकरी खेती मगर इस पर कोई सरकार ध्यान नहीं देती। आपके पिताजी को सलाम। जय हिंद, जय किसान!"
                                   - अमर बहादुर सिंह

  "एक बार भादों के महीने में अतिसय वृष्टि हुई चारों तरफ पानी ही पानी नज़र आ रहा था।बैलों का चारा(भूसा) समाप्त हो गया था और सीवान में ऊँचाई वाली जगहों पर ही थोड़ी बहुत घास बची थी जिसके सहारे पिता जी किसी तरह दोनों बैलों को जिन्दा रखे हुए थे पर उनका पेट नहीं भर पा रहा था और वे दिन भर हुकड़ते रहते थे।जब सीवान की घास भी समाप्त हो गयी तब पिताजी के सामने बैलों के चारे की विकट समस्या उत्पन्न हो गयी।कहते हैं समस्या ही अविष्कार की जननी होती है।पिताजी भी चारे का विकल्प पीपल की पत्ती के रूप में खोज लिये।पिताजी रोज पीपल के पेड़ पर चढ़ कर पत्ती तोड़ते और पत्ती का चारा बाल कर बैलों को खिलाते । एक दिन बहुत तेज बारिस हुई और पिताजी पीपल की पत्ती तोड़ने के चक्कर में पेड़ से फ़िसल कर गिर गये और उस दिन बैलों को चारा नहीं मिला।सोकना और धौरा दिन भर भूख के मारे हुकड़ते रहे।शाम को माँ पिताजी का खाना लेकर आई। पिताजी बरदौल में बधे बैलों को अपलक देख रहे थे माँ बोली खाना खा लीजिये सोचने से क्या होगा? पिताजी की आँखों से अश्रुधारा बह निकली, माँ की ओर खाने की थाली सरका दिये और बोले जो मुझे खिलाते रहे वही नहीं खा पाये तो मैं खाकर क्या करूँगा।पिताजी उस रात बैलों के साथ भूखे ही सो गए!....."     
                                       - हरीन्द्र प्रसाद

" किसानी  यथार्थ से अवगत कराती आपकी यह पोस्ट बहुत ही मार्मिक है भाई।भगवान ईंट पाथर में नहीं होता।...
  देवता बसते हैं खेतों में, खलिहानों में।"  
                                     - शिवेंद्र कुमार मौर्य

".....इसमें दर्द का एक टुकड़ा मेरा भी है! जिन्होंने सचमुच खेती-किसानी में कुछ साल गुजारे हैं वे समझ सकते हैं आपके और आपके पिताजी के दिल का यह हाल।....नीलगायें ही नहीं, न जाने कहाँ से इन क्षेत्रों के लिए अनेक अजनबी जानवर पिछले कुछ सालों से इधर हांक दिए गए जो फसलों की नष्ट कर किसानों की किसानी नष्ट कर उन्हें बेसहारा बना रहे हैं। इन्हीं में जंगली सुअर भी है जो इंसानों पर भी हमला बोलता है। मुझे लगता है, यह बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मायाजाल है जो देश के लोगों के जीवन को पूरी तरह अपनी मुट्ठी में कैद कर लेना चाहती हैं, लोगों को रोटी के लिए भी अपने रहमो-करम पर मजबूर करना चाहती हैं। 
        इस पर विचारा और लिखा जाना ही नहीं, लोगों को लामबंद भी किया जाना चाहिए। वरना खेती-किसानी ही नहीं किसान भी नहीं बचेगा, मरेगा-मारा जाएगा!...आपके-हमारे पिता कब तक रहेंगे!...
        यह 'प्रलय-प्रवाह' देखा, समझा और रोका जाना चाहिए।..."
                                                               - अशोक प्रकाश
                                               फोटो प्रस्तुति : रामचन्द्र शुक्ल 
                                       
                                        ●●● ●●●

Comments

  1. सचमुच किसानों की हालत बहुत खराब है।

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