आत्मालाप-9: दोस्तों के पाँव


                                   दोस्तों के पाँव

                                                 - अशोक प्रकाश




काश!
आसमान सर पर 
उठाए बिना
धरती पर होते
दोस्तों के पाँव...

धीरे-धीरे 
हम साथ चलते
पहुंच ही लेते
सपनों के गाँव!

थके होते
जख़्मों पर
झुके होते 
सहलाती पुरवैया
दुलराती छाँव!

जंगल में मंगल
नहीं होता
भले ही
मिलती तो फिर भी
एक सुबह 
एक ठाँव!

काश!
सूरज छुपा होता
भले ही बादलों में
किरणें बतातीं पता
उसका रंग
उसका दांव!... ★★★

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