कविता: न छापेगा कोई अखबार - रमेशराज
तेवरीकार कवि रमेश राज की दो कविताएँ
एक:
तिमिर ने घेरा सुखद प्रभात, न छापेगा कोई अख़बार
भोर के बदले आयी रात, न छापेगा कोई अख़बार ।
दिखायी देता अजब जूनून, उतारी सब भेड़ों से ऊन
लगाये बैठे चीते घात, न छापेगा कोई अख़बार।
हुआ सारी ख़ुशियों का अंत, दिखायी देता अजब वसंत
सूखे हरे-हरे सब पात, न छापेगा कोई अख़बार ।
पुजें अब केवल तस्कर-चोर, मंच पर छाये आदमखोर
बढ़ी हर नंगे की औकात, न छापेगा कोई अख़बार।
कि जिसकी खातिर बना विधान, उसी का कदम-कदम अपमान
उसी जनता को गहरी मात, न छापेगा कोई अख़बार।
दो:
बताकर- “दूंगा जीवन-दान "
और कितनों की लेगा जान ?
अहिंसा से हिंसा का खेल
ख़िलाड़ी तू भी बड़ा महान !!
हमें भी दीख रहा उत्थान
कंठ से गायब हैं मधुगान।
छीन ली कोयल जैसी कूक
अधर से फूलों-सी मुस्कान।।
बता पहले-सा सीना तान
कहाँ तक झेलें हम तूफान ?
कभी तो हो आफत का अंत
ढहे जाते सारे अनुमान।
🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥

Right sir!
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