आया वसंत!:


                             वसंत पर चार कविताएँ

        साभार: राजकमल प्रकाशन


सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला':

सखि, वसंत आया
भरा हर्ष वन के मन
नवोत्कर्ष छाया
सखि, वसंत आया!

किसलय-वसना नव-वय-लतिका
मिली मधुर प्रिय उर तरु-पतिका,
मधुप-वृन्द बंदी
पिक-स्वर नभ सरसाया
सखि, वसंत आया!

लता-मुकुल हार गंध-भार भर,
बही पवन बन्द मन्द मन्दतर
जागी नयनों में वन-
यौवन की माया
सखि, वसंत आया!

आवृत सरसी उर सरसिज उठे
केशर के केश कली के छुटे
स्वर्ण शस्य अँचल
पृथ्वी का लहराया
सखि, वसंत आया! ■

सोहनलाल द्विवेदी:

सरसों खेतों में उठी फूल
बौरें आमों में उठीं झूल
बेलों में फूले नये फूल

पल में पतझड़ का हुआ अंत
आया वसंत आया वसंत।

लेकर सुगंध बह रहा पवन
हरियाली छाई है बन बन,
सुंदर लगता है घर आँगन

है आज मधुर सब दिग दिगंत
आया वसंत आया वसंत।

भौरे गाते हैं नया गान,
कोकिला छेड़ती कुहू तान
हैं सब जीवों के सुखी प्राण,

इस सुख का हो अब नही अंत
घर-घर में छाये नित वसंत। ■


सुमित्रानंदन पंत:

फिर वसंत की आत्मा आई!
मिटे प्रतीक्षा के दुर्वह क्षण,
अभिवादन करता भू का मन !
दीप्त दिशाओं के वातायन,
प्रीतिसांस-सा मलय समीरण,
चंचल नील, नवल भू यौवन,
फिर वसंत की आत्मा आई,
आम्र मौर मेंगूंथ स्वर्ण कण,
किंशुक को कर ज्वाल वसन तन !
देख चुका मन कितने पतझर,
ग्रीष्म शरद, हिम पावस सुंदर,
ऋतुओं की ऋतु यह कुसुमाकर,
फिर वसंत की आत्मा आई,
विरह मिलन के खुले प्रीति व्रण,
स्वप्नों से शोभा प्ररोह मन !
सब युग सब ऋतु थीं आयोजन,
तुम आओगी वे थीं साधन,
तुम्हें भूल कटते ही कब क्षण?
फिर वसंत की आत्मा आई,
देव, हुआ फिर नवल युगागम,
स्वर्ग धरा का सफल समागम ! ■


अज्ञात ('भदोही' ब्लॉग से साभार):

जो खींच रहे माल उन्हीं का वसंत है
मोटी है जिनकी खाल उन्हीं का वसंत है।

सारी व्यवस्था जिनके आगे पूंछ हिलाए,
किसकी मजाल उसको कोई आंख दिखाए,
टेढ़ी है जिनकी चाल उन्हीं का वसंत है।

जो उल्टे-सीधे तल्ख सवालों से दोस्तो,
हां, आयकर की टीम के जालों से दोस्तो,
बच जाएं बाल-बाल उन्हीं का वसंत है।

न सींक भी कभी यहां सरकाई जिन्होंने,
कोई बहादुरी भी नहीं दिखलाई जिन्होंने,
लेकिन बजाएं गाल उन्हीं का वसंत है।

जब काम हो तो गदहे को भी बाप बनाएं,
मतलब के लिए उल्लुओं को शीश झुकाएं,
पर दें बड़ी मिसाल उन्हीं का वसंत है।

अब किससे कहें हाल अजी चुप रहें मियां,
लाचार किसी ताल की वोटर हैं मछलियां,
फैला रहे जो जाल उन्हीं का वसंत है!

जो खींच रहे माल उन्हीं का वसंत है
मोटी है जिनकी खाल उन्हीं का वसंत है। ■

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