उभरता किसान-आंदोलन
उभरता किसान-आंदोलन
- अशोक प्रकाश
"ले मशालें चल पड़े हैं
लोग मेरे गांव के,
अब अंधेरा जीत लेंगे
लोग मेरे गांव के!..."
-बल्ली सिंह चीमा की यह कविता भारत के वर्तमान इतिहास के इस दौर और उभरते जबरदस्त किसान-आंदोलन पर बिल्कुल ठीक बैठती है!...कवि की कल्पनाओं में शायद देश के किसानों के जागने और वर्तमान अंधकार यानी दुर्व्यवस्था से दो-दो हाथ कर उसे परास्त करने की कामना ही रही होगी। किसान के हाथ में मशाल की जगह लाल झंडा है, वह मशाल बनकर वर्तमान अंधकार को परास्त कर देगा- यह देखना अभी बाकी है। पर जिस जीवटता और उत्कट संघर्ष की अदम्य इच्छा की अभिव्यक्ति उसने की है, वह आगे रंग लाएगी।
हालांकि उसकी राजनीतिक अगुवा पार्टी को संसदीय/विधान सभा चुनावों में झटके लगे हैं, लेकिन शायद किसानों ने अपनी एकजुटता प्रदर्शित कर उसे भी अपनी रणनीतियों में बदलाव लाने की कुछ सीख दी होगी, पर यह अत्यंत गम्भीर मसला केवल इतना भर नहीं है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ही नहीं बल्कि तमाम कम्युनिस्ट-समाजवादी संगठनों और उनके समर्थक लोगों को शायद इन ज़बर्दस्त प्रदर्शनों ने खुशी के साथ यह चिंता भी दी होगी कि -आगे क्या? किसान बदलाव के लिए आगे आने और संघर्ष में अपनी भागीदारी निभाने को तैयार है पर आप उसे क्या देने-दिलाने की सोच रखते हैं? उसने तो साम्यवादी क्रांति के मुख्य सूत्रधार रहे लेनिन की मूर्ति तोड़े जाने का भी प्रतीकात्मक विरोध जता दिया, अब सवाल बाकी लोगों के सामने है!....यह सवाल केवल मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सामने नहीं है बल्कि तमाम उन संगठनों के सामने है जिनके आह्वान पर किसान कभी देश के इस कोने तो कभी उस कोने अपने जवाब के लिए दौड़ रहा है।...
(सभी चित्र व्हाट्सएप के विभिन्न समूहों से साभार)
तो शासकों, आप कब और कहाँ अपना आशियाना बना रहे हैं?...क्योंकि किसान कहीं नहीं जाने वाला, 'वंदे मातरम...' गाये बिना भी इस देश की मिट्टी ही उसकी माँ है...उसका स्वर्ग है! आपने ही उसकी इस 'स्वर्गादपि गरीयसी'-धरा को पूरी दुनिया के लुटेरों के साथ मिलकर नरक बना रखा है!... ★★★





I didn't believe that even peasants could be so dedicated...
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