'सितमगरों जवाब दो!....'
🔵 बच्चियों पर आफ़त...🔵
समाधान क्या है?
⁉⁉⁉⁉⁉⁉⁉⁉⁉⁉
इधर कठुआ में आठ साल की मासूम से एक मंदिर में हुए सामूहिक बलात्कार और हत्या तथा उन्नाव में एक लड़की के साथ बलात्कार और न्याय की मांग करने गए उसके पिता की हत्या में विधायक की संलिप्तता के खिलाफ़ राष्ट्रीय स्तर पर आक्रोश और आततायियों के खिलाफ़ नफ़रत बढ़ रही है, उधर 'आग लगाने के बाद राख पर पानी' डालने का काम शुरू हो गया है। विशेषकर दोनों ही मामलों में सामाजिक और राजनीतिक सत्ताधारियों की संलिप्तता के कारण तरह-तरह के बेरोजगारी-नोटबन्दी-जीएसटी आदि के हमलों की मार झेल रही आम-आवाम का धैर्य जैसे जवाब देने लगा है! जो लोग सोचते हैं कि चुनाव में जीत के बाद जनता उन्हें हिटलर का हौसला दे देती है, वे भूल जाते हैं कि जनता यह भी जल्दी समझ जाती है कि ये चुनाव कैसे जीते जाते हैं। छले जाने का अहसास जहां छले गए लोगों की पीड़ा कई गुनी बढ़ा देता है वहां छली-कलाकारों के खिलाफ़ उनकी नफ़रत भी इससे बहुत बढ़ जाती है। राजाओं-महाराजाओं-बादशाहों-हिटलरों की ताकत कितनी ही अतुलनीय-दुर्दमनीय क्यों न लगे, एक दिन वह धूल चाटती है! स्वयं को भगवान तक घोषित करने-करवाने वाले राजे-महाराजे भी जनशक्ति के प्रयोगों के चलते धराशायी और काल-कवलित हो घृणा के इतिहास का हिस्सा बन गए।...इसलिए इन मसलों पर घडियाली आँसू काम नहीं करेंगे, न ही इसे किसी अन्य कामचलाऊ तरीके से हल किया जा सकता है!...न्यायालय की भी अपनी सीमाएँ हैं!
सवाल है कि इन क्रूर अमानुषिक घटनाओं के दोषी क्या सिर्फ वे हैं जो इन्हें अंज़ाम देते हैं? आखिर उनका इतना घिनौना मानस बन कैसे जाता है?...उनके घरों-परिवारों में भी भुक्तभोगियों की तरह के लोग रहते है- मां-बहनें-बेटियाँ! सच्चाई यही है कि जैसे निर्भया-कांड के दोषी कोई स्वस्थ सामान्य मनुष्य या आगा-पीछा सोच सकने वाले लोग नहीं थे, वैसे ये भी अस्वस्थ-विकृत-पाशविक मानसिकता के लोग हैं! ऐसे में एक स्वाभाविक सवाल हमारे मन में कौंधता है- क्या यह समाज एक विक्षिप्त या अधपगले समाज में तब्दील होता जा रहा है?....आखिर कठुआ हो या उन्नाव, समाज में ऐसी घटनाएँ कैसे घट सकती हैं? क्या यह सिर्फ़ 'यौनिकता' का मसला है जैसा कि कुछ तथाकथित राष्ट्रवादी बुद्धिजीवी कहते हैं?
या फिर यह एक ऐसे 'उत्पाद' का परिणाम है जिसका उत्पादन किया जाना मुनाफ़ाखोरों के लिए बहुत जरूरी है? या फिर यह उस कुंठित समाज की परिणति है जो अपना भला-बुरा नहीं देख पाता और अनेक अंधविश्वासों और विकृतियों में जिये जाता है?....सवाल जितने कठोर लगते हैं जवाब उससे भी कठोर हो सकते हैं! आप 'ना' कहकर कब तक छिप या बच सकते हैं यदि यथार्थ की भयावहता सब कुछ निगल जाना चाहती हो! गली-गली पोर्न या अश्लील साहित्य की पहुँच क्या आदर्श और नैतिकता का पाठ पढ़ाएगी? कैसे और क्यों पहुंच रहा है यह सब, खासकर बच्चों तक भी इस आधार और हैकिंग के युग में?...क्या यह सब रोका नहीं जा सकता? क्या संकीर्णताओं और नफरतों का उन्माद ही इसका जिम्मेदार है?
सवालों से बचकर नहीं, उनका सही-सटीक जवाब ढूंढ़कर ही इससे बचा जा सकता है। न्यायालय का न्याय समाज नहीं बदल सकता! समाज बदलने के लिए एक सही सामाजिक-चेतना विकसित होना जरूरी है, सही गलत के बीच फर्क़ करना जरूरी है! किसी अपराध की सजा सिर्फ़ एक उदाहरण बन कर रह जाती है यदि विषबीज हर जगह हर रोज़ बोये जा रहे हों! ★★★
एक सामाजिक चेतना से पहले एक स्वस्थ मानसिक चेतना का होना जरुरी है
ReplyDeleteबहुत महत्त्वपूर्ण बात है ' स्वस्थ सामाजिक मानसिक चेतना', वरना तथाकथित सामाजिक-चेतना एक भीड़ का उन्माद भी बन जाती है।
ReplyDelete