ज्ञान और धर्म- 1:


                                   धर्म, तर्क और ज्ञान

                                                    - अर्पित द्विवेदी

सेमटिक रिलिजन्स(यहूदी, ईसाई, इस्लाम) के धार्मिक ग्रंथों में आदम और हव्वा को प्रथम मानव कहा गया है जिनको ईश्वर ने रचना के उपरांत जन्नत के बाग़ में रखा था लेकिन शैतान द्वारा उकसाने पर उन्होंने ज्ञान के वृक्ष का फल खा लिया और उनको ज्ञान हो गया जिसके कारण ईश्वर ने उनको जन्नत से निष्कासित कर दिया। शैतान का चरित्र सेमेटिक धर्मों के ग्रंथों में एक ऐसे पात्र की तरह है जो लोगों के मन में धर्म के प्रति संदेह डालता है और उन्हें ईश्वर के बताये मार्ग से भटका देता है। क्या कभी आपने विचार किया कि इस कथा और इसके पात्रों के जरिये वास्तव में क्या सन्देश देने की कोशिश की गई है?

धर्मगुरु इस बारे में कुछ भी कहते रहें लेकिन सन्देश साफ़ है-

“ईश्वर मनुष्य के ज्ञान अर्जन को पसंद नहीं करता। न ही वह चाहता कि मनुष्य संदेह करे। और मनुष्य के स्वविवेक के इस्तेमाल से तो उसे सख्त चिढ़ है। वह केवल और केवल अनुसरण चाहता है।“

यदि आप इन धर्मों के ग्रंथों का अध्ययन करेंगे तो आप पाएंगे कि इनका केन्द्रीय भाव यही है कि जो भी निर्देश दिया जा रहा है उसे बिना सवाल उठाये मानना जरुरी है। उन निर्देशों पर सवाल उठाना, संदेह करना, उनका विरोध अथवा उल्लंघन करना निषिद्ध है, और ऐसा करना न केवल आपको लौकिक बल्कि अलौकिक जगत में दंड और भयंकर यातनाओं का भागीदार बना सकता है। जबकि उन निर्देशों का पालन करने पर तरह तरह के लुभावने लौकिक अलौकिक पुरुस्कारों का प्रलोभन है।

लोगों को ज्ञानार्जन से रोककर अनुसरण करने के लिए बाध्य करने के पीछे आखिर क्या कारण है? ईश्वर के मार्ग में बुद्धि बाधा क्यों है? आखिर ऐसी अपेक्षा क्यों रखी जा रही है कि लोग ईश्वर और उसके निर्देशों को समझने में बुद्धि का प्रयोग न करें? तथाकथित ईश्वरीय संदेशों पर संदेह न करें? यदि ईश्वर चाहता है कि लोग बुद्धि और तर्कशक्ति का प्रयोग न करें तो उसने यह उन्हें दी ही क्यों?

दरसल धर्म का आविष्कार कुछ ही आम जनता को एक समूह के रूप में संगठित रखने और कुछ निर्धारित नियमों के अंतर्गत नियंत्रित करने के लिए किया गया था, ताकि उनको भेड़ों की तरह हांका जा सके। लोगों को इस तरह से नियंत्रित करने का केवल एक ही तरीका था कि उनको संदेह करने, अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करने और ज्ञानार्जन से रोककर सपर्पित भाव से कुछ तय नियमों का अनुसरण करने को कहा जाए। लेकिन ऐसा करने के लिए कोई भी व्यक्ति स्वाभाविक रूप से राजी नहीं होता तो ऐसा कहा गया कि ईश्वर ऐसा चाहता है।

बुद्धि प्रकृति प्रदत्त वह टूल है जो आपको अतार्किक बातों को स्वीकारने से रोकती है, आपको आगाह करती है कि यहां कुछ गड़बड़ है, आपको छले जाने से बचाती है। हर धर्म का इस प्रकृति प्रदत्त टूल से विशेष बैर है। क्योंकि यही उनकी अतार्किक बातों को स्वीकारने में सबसे बड़ी बाधा है। इसीलिए धर्म बार बार आपको बुद्धि के प्रयोग से रोकता है, संदेह को पाप बताता है और श्रद्धा, विश्वास, आस्था पर बार बार जोर देता है। यहाँ तक की धार्मिक ग्रंथों और धार्मिक प्रतीकों के लिए भी भावनात्मक जुडाव, एक विशेष पवित्रता का भाव पैदा किया जाता है ताकि लोग इन पर कोई अप्रिय सवाल न उठा सकें।

बुद्धि, तर्कशक्ति और संदेह आपके शत्रु नहीं मित्र हैं जो आपको मूर्ख बनने से बचाते हैं। यदि कोई आपको इन मित्रों को छोड़ने पर बल दे रहा है तो वह निश्चित ही आपको मूर्ख बनाना चाहता है।
                      (फ़ेसबुक से साभार)     ★★★

Comments

  1. सठिक और तार्किक आपने सही लिखा मै सहमत हू
    धर्म एक छलावा है जो हमे हमारे बुद्धि को पंगू बना कर किसी बयकती बिशेष की भगवान् मानने को बाध्य करती है

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  2. This comment has been removed by the author.

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    1. सबसे बुरी बात है कि अंधविश्वासों और आडम्बरों तथा इनके प्रचारकों की गप्पों को भी धर्म कहा जाता है, भाई ज्वाला सिंहजी!...

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