अटेवा: सरकार की 'ना' को 'ना'!


                     'पुरानी पेंशन बहाली' आंदोलन:
                                 बढ़ता जनाक्रोश
  

        कोई भी सरकार अपने आदेशों के खिलाफ़ जनाक्रोश का उभार नहीं देखना चाहती!...लेकिन लोगों के बर्दाश्त की भी एक हद होती है! आप सत्ता में होते हैं तो अपने सारे वायदों, सारे भाषणों को भूलकर अपने या अपने लोगों के नफ़े-नुक़सान के हिसाब से फैसले करने लगते हैं। आपको अपना वर्गीय हित सबसे ऊपर नज़र आता है। आप यह भी भूल जाते हैं कि आपको दुबारा जनता के बीच जाना है। नहीं, आप समझते हैं कि आप जनता की इच्छाओं से नहीं अपने हितैषियों के कंधे पर चढ़कर सत्ता पाते हैं। इसीलिए आपको जनता की कोई फिक्र नहीं होती। आप ऐसा कर सकते हैं, इसलिए ऐसा करते हैं!...
           पर जनता क्या करे?...वह सिर्फ आपका विरोध कर पाती है। आपको वह भी अच्छा नहीं लगता! आप नहीं चाहते कि आपको लोग बेनक़ाब करें!...पर ऐसा नहीं होता। ऐसा कभी नहीं हुआ! आप राजा-महराजा थे तब भी आपका विरोध हुआ। आपने रामनामी ओढ़ ली है या लकलक कुर्ता-पैजामा पहन 'जनता के सेवक' बन घूम रहे हैं, तब भी आपका विरोध हो रहा है। आप अलग हैं, शासक हैं। जनता अलग है, शासित है।
            जनता आपकी जन-विरोधी नीतियों के खिलाफ़ सड़क पर उतर रही है। धरना-प्रदर्शन कर रही है। पुरानी पेंशन बहाली के लिए भी जनता सड़क पर है, रामलीला ग्राउंड में है। सुधर जाइए। शिक्षकों-कर्मचारियों की पुरानी पेंशन बहाल कीजिए!...
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